रुद्रप्रयाग। नवरात्र की सप्तमी तिथि पर शनिवार को कालीमठ शक्तिपीठ आस्था और भक्ति से सराबोर रहा। तड़के भोर से ही श्रद्धालुओं की भीड़ माता के दरबार में उमड़ पड़ी। भक्तों ने माँ कालरात्रि की पूजा-अर्चना कर जीवन से भय और संकट दूर करने की कामना की।
अनोखी परंपरा
देवभूमि उत्तराखंड का यह शक्तिपीठ अपनी अनूठी परंपरा के लिए जाना जाता है। यहाँ न तो मूर्ति पूजा होती है और न ही पारंपरिक तरीके से आराधना। माँ की पूजा श्रीयंत्र और गुप्त पीठ पर की जाती है। यही कारण है कि कालीमठ तंत्र साधना का केंद्र माना जाता है और देशभर से साधक यहाँ साधना के लिए आते हैं।
रक्तबीज वध से जुड़ी मान्यता
पौराणिक मान्यता है कि इसी पावन धाम में माँ काली ने असुर रक्तबीज का वध किया था। कहा जाता है कि आज भी मंदिर प्रांगण में स्थित गुप्त कुंड उस ऐतिहासिक घटना का प्रतीक है, जहाँ माँ की दिव्य शक्ति का साक्षात अनुभव होता है।
वातावरण गूंजा जयकारों से
सप्तमी पर पूरे मंदिर परिसर में जय माँ काली के जयकारे गूंजते रहे। ढोल-नगाड़ों, शंखनाद और भक्ति गीतों ने वातावरण को अलौकिक बना दिया। दूर-दराज़ से आए श्रद्धालुओं ने माता के दरबार में आस्था अर्पित की और दर्शन कर स्वयं को धन्य महसूस किया।






