(भूपेन्द्र भण्डारी/ Tehelka uk न्यूज/रुद्रप्रयाग)
ढोलसागर के मर्मज्ञ बिंदी लाल ने पहाड़ी लोकसंस्कृति के संरक्षण को लेकर गहरी चिंता जताई है। उनका कहना है कि आज की नई पीढ़ी ढोलसागर जैसी समृद्ध लोकविद्या से लगभग अनजान होती जा रही है, जबकि यही हमारी पहाड़ की संस्कृति, परंपरा और विरासत की पहचान है। इसे जीवंत रखना केवल कलाकारों की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है।
बिंदी लाल बताते हैं कि ढोलसागर केवल वादन की विधा नहीं, बल्कि पांडव देवताओं से जुड़ी कथाओं, रसाओं और परंपराओं का जीवंत दस्तावेज है। अलग-अलग पांडव देवताओं की अलग-अलग कथाओं के अनुसार ढोल की थाप और रासा बदलते हैं, जो इस विधा को और भी विशिष्ट बनाता है। दुर्भाग्य से आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के बीच यह परंपरा धीरे-धीरे हाशिये पर जा रही है।
इसी कड़ी में हाल ही में रुद्रप्रयाग जनपद के पूनाढ़ गांव में आयोजित पांडव नृत्य के दौरान बिंदी लाल ने ढोलसागर विधा का प्रभावशाली प्रदर्शन किया। उनकी प्रस्तुति ने न केवल दर्शकों को लोकसंस्कृति से जोड़ा, बल्कि युवाओं में भी इस परंपरा को जानने और समझने की जिज्ञासा पैदा की। ग्रामीणों और संस्कृति प्रेमियों ने इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे आयोजनों से ही लोकधरोहर को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जा सकता है।
बिंदी लाल का मानना है कि यदि समय रहते ढोलसागर और इससे जुड़ी लोकपरंपराओं को सहेजने के ठोस प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले समय में यह अमूल्य विरासत केवल पुस्तकों तक सीमित रह जाएगी। ऐसे में आवश्यक है कि समाज, प्रशासन और सांस्कृतिक संस्थाएं मिलकर इस लोकविद्या के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए आगे आएं।






