रुद्रप्रयाग । प्रयागराज में माघ स्नान के दौरान हुए विवाद के बाद ज्योतिषपीठ (ज्योतिर्मठ) के शंकराचार्य पद को लेकर पुराना विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। संत समाज के एक वर्ग ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को ज्योतिषपीठ का वैध शंकराचार्य मानने से इनकार करते हुए उनकी दावेदारी को शास्त्रीय परंपरा के खिलाफ बताया है।
विरोध कर रहे संतों का कहना है कि यह मामला न्यायालय में भी विचाराधीन है और उनके अनुसार स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पट्टाभिषेक को लेकर रोक की स्थिति बनी हुई है, हालांकि इस पर आधिकारिक दस्तावेज और दूसरे पक्ष की स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
संतों के अनुसार विवाद की जड़ ज्योतिषपीठ की उत्तराधिकार परंपरा में है। उनका दावा है कि वर्ष 1992–93 में काशी विद्वत परिषद और प्रमुख धर्माचार्यों की सहमति से स्वामी माधवाश्रम जी महाराज को विधिवत रूप से ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य अभिषिक्त किया गया था और मठाम्नाय व्यवस्था के अनुसार वही परंपरा वैध मानी जाती है।
संत समाज का तर्क है कि एक संन्यासी एक समय में केवल एक ही पीठ का शंकराचार्य हो सकता है, इसी आधार पर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती और उनके शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का ज्योतिषपीठ पर दावा स्वीकार्य नहीं है।
इस बीच कंकालेश्वर मठ पौड़ी के महंत अभयचेतनानंद ने आरोप लगाया है कि ज्योतिषपीठ की शंकराचार्य व्यवस्था परंपरा के बजाय भ्रम और दबाव के जरिए स्थापित की जा रही है। वहीं ऋषिकेश में जल्द ही एक बैठक प्रस्तावित बताई जा रही है, जिसमें माधवाश्रम परंपरा से जुड़े संत आगे की धार्मिक प्रक्रिया पर निर्णय ले सकते हैं।
दूसरी ओर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थक उन्हें विधिवत शंकराचार्य बताते हैं। ऐसे में ज्योतिषपीठ का यह विवाद अब आस्था के साथ-साथ परंपरा, संस्थागत अधिकार और कानूनी प्रक्रिया से भी जुड़ता जा रहा है।





