तुंगनाथ-चोपता की खूबसूरती पर प्लास्टिक का दाग, पर्यावरणविद् अनिल प्रकाश जोशी बोले — “बैन नहीं, स्थानीय विकल्प ही समाधान”

रुद्रप्रयाग । तृतीय केदार भगवान तुंगनाथ की पावन धरती और चोपता की मनमोहक वादियां आज भी प्रकृति प्रेमियों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। कभी यहां पर्यटक बर्फबारी का आनंद लेने पहुंचते हैं तो कभी हजारों श्रद्धालु बाबा तुंगनाथ के दर्शन के लिए कठिन पैदल यात्रा तय करते हैं। लेकिन प्रकृति की इस अनोखी सुंदरता पर अब प्लास्टिक और गंदगी का दाग गहराता दिखाई दे रहा है।
तुंगनाथ-चोपता मार्ग पर जगह-जगह प्लास्टिक की बोतलें, खाने-पीने के रैपर और अन्य कचरा बिखरा पड़ा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि बड़ी संख्या में आने वाले पर्यटक और यात्री स्वच्छता के प्रति गंभीर नजर नहीं आ रहे हैं। पहाड़ों की शांति और हरियाली के बीच फैली यह गंदगी अब पर्यावरण के लिए खतरा बनती जा रही है।
इस गंभीर विषय पर पद्मश्री से सम्मानित प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और हेस्को के संस्थापक अनिल प्रकाश जोशी ने चिंता जताते हुए कहा कि केवल प्रतिबंध लगाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। उन्होंने सिक्किम का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां प्लास्टिक पर प्रभावी प्रतिबंध लागू किया गया है, लेकिन इसके लिए पहले मजबूत तैयारी की गई।
उन्होंने कहा कि आज करीब 70 प्रतिशत खाद्य उत्पाद ऐसे हैं जो चलते-फिरते खाए जाते हैं और पूरी तरह प्लास्टिक पैकेजिंग पर निर्भर हैं। ऐसे में यदि बिना विकल्प तैयार किए प्रतिबंध लगाया जाएगा तो कई व्यावहारिक समस्याएं सामने आएंगी। उनका मानना है कि स्थानीय स्तर पर उत्पाद तैयार कर प्लास्टिक पर निर्भरता कम की जा सकती है।
अनिल प्रकाश जोशी ने कहा कि पहाड़ का आलू देशभर में प्रसिद्ध है और स्थानीय स्तर पर चिप्स जैसे उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। कृषि और हॉर्टिकल्चर को पर्यटन से जोड़कर स्थानीय रोजगार भी बढ़ाया जा सकता है और प्लास्टिक का उपयोग भी कम किया जा सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि केवल नियम बनाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि यात्रियों और पर्यटकों में प्रकृति के प्रति समझ और संवेदनशीलता पैदा करनी होगी। पर्यटक यहां आते हैं, दर्शन करते हैं और वापस लौट जाते हैं, लेकिन प्रकृति को महसूस करना और उसे सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी है।
उन्होंने कहा कि अब केदार घाटी से ही प्लास्टिक मुक्त और प्रकृति संरक्षण की नई सोच शुरू करने की जरूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी तुंगनाथ-चोपता की इसी अद्भुत सुंदरता को करीब से महसूस कर सकें।

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