दस्तक पहाड़ द्वारा 17वां फूलदेई महोत्सव आयोजित…बुरांश-फ्यूली के फूलों संग बच्चों ने रच दिया यादगार पल,फूलदेई महोत्सव में परंपरा और प्रतिभा का दिखा सुंदर संगम..

बसंत ऋतु के आगमन और चैत्र संक्रांति के अवसर पर आठ दिनों तक मनाए जाने वाले उत्तराखंड के पारंपरिक बाल पर्व फूलदेई महोत्सव के तहत अगस्त्यमुनि में घोघा जातरा प्रतियोगिता का भव्य आयोजन किया गया। दस्तक पहाड़ परिवार द्वारा आयोजित इस 17वें महोत्सव में बच्चों का उत्साह देखते ही बन रहा था। कार्यक्रम की शुरुआत सुबह बेड़ूबगड़ से हुई, जहां से बच्चे विजयनगर होते हुए अगस्त्यमुनि तक पारंपरिक वेशभूषा में बुरांश और फ्यूली के फूलों से सजी फुलकांडी और घोघा डोली लेकर प्रभात फेरी में शामिल हुए। इस दौरान बच्चों ने फूलदेई के पारंपरिक लोकगीत गाकर पूरे क्षेत्र को लोक संस्कृति के रंग में रंग दिया।
प्रतिभाग करने आए बच्चों ने बताया कि वे पूरे साल इस पर्व का इंतजार करते हैं और इस बार प्रतियोगिता में शामिल होकर उन्हें बेहद खुशी हो रही है। इस आयोजन में कुल 25 टीमों ने प्रतिभाग किया और अपनी पारंपरिक प्रस्तुतियों से लोक संस्कृति की झलक पेश की।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद महिला आयोग की उपाध्यक्ष ऐश्वर्या रावत ने कहा कि फूलदेई पर्व उत्तराखंड की समृद्ध लोक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार भी इस पर्व को बढ़ावा दे रही है और इसे विद्यालयों में बाल पर्व के रूप में मनाया जा रहा है, जिससे नई पीढ़ी अपनी संस्कृति से जुड़ी रहे।
दरअसल, पहाड़ के गांवों में घोघा माता को देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है और फूलदेई पर्व के दौरान ही उनकी डोली बाहर निकाली जाती है। खास बात यह है कि इस परंपरा का निर्वहन बच्चे ही करते हैं, जो इस पर्व को और अधिक विशिष्ट बनाता है।
दस्तक पहाड़ के संयोजक दीपक बेंजवाल और कालिका काण्डपाल ने बताया कि एक समय ऐसा भी आया जब शहरी क्षेत्रों में यह परंपरा धीरे-धीरे विलुप्त होने लगी थी। ऐसे में इस लोक परंपरा को जीवित रखने के उद्देश्य से इस कार्यक्रम की शुरुआत की गई, जो अब लगातार 16 वर्षों से सफलतापूर्वक आयोजित हो रहा है और हर वर्ष इसमें बच्चों की भागीदारी बढ़ती जा रही है।
फूलदेई महोत्सव के इस आयोजन ने न केवल बच्चों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ा, बल्कि स्थानीय लोक परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में भी एक मजबूत संदेश दिया।

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